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يُغلي
فؤادي، وما
يُشجيكِ
يُشجيني
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يا
دجلةَ الخير:
ما يُغْليكِ
من حَنقٍ
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في
مائكِ
الطُهرِ بين
الحين
والحينِ
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ما
إن تزالُ
سياطُ
البغْى
ناقعةً
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على
القُرى -
آمناتٍ -
والدهاقينِ
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ووالغاتٌ
خيولُ
البغْيِ
مُصبحةً
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به
مجاريك من
فوقٍ إلى
دُونِ
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يا
دجْلَة
الخير: أدري
بالذي
طَفحتْ
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أنغامُكِ
السمّرُ عن
أناتِ
محزونِ
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أدري
على أيّ
قيثارٍ قد
انفجرتْ
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للآنَ
تهزْينَ من
حكمِ
السلاطين
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أدري
بأنك من ألفٍ
مَضَتْ
هَدراً
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من
النواويس
أرواحُ
الفراعينِ(12)
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تَهزين
أنْ لم
تَزَلْ في
الشرق
شاردةً(11)
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على
الضفافِ ومن
بُؤسِ
الملايينِ
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تهزين
من خِصْب
جنّاتٍ
مُنثرةٍ
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أضفوْا
دروع
مطاعيمٍ
مطاعينِ
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تهزيْنَ
من عُتقاءٍ
يوم ملحمةٍ(13)
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كما
تلوّى ببطن
الحوت ذو
النونِ
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الضارعين
لأقدارٍ
تحِلُّ بهمْ
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ويفزعون
إلى حدْسٍ
وتخمينِ
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يروْن
سود الرزايا
في حقيقتها
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والمُفضلينَ
عليه جَدْعَ
عِرْنينِ(14)
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والخائفين
اجتداع
الفقر
مالهمو
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مستعصمين
بحبْلٍ منه
موهونِ
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واللائذين
بدعوى الصبر
مَجْبنةً
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ومستميتٍ،
ومنجاةً
لمسكينِ
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والصبرُ
ما انفكّ
مرداةً
لمحتربٍ(15)
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وأيّ
شرٍّ بخيرٍ
غيرُ مقرونِ
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يا
دجلةَ الخير:
والدنيا
مفارقةٌ
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طهْرُ
الملائكِ من
رجْسِ
الشياطينِ
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وأيُّ
خيْرٍ بلا
شرٍّ
يُلقّحهُ
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لديْكِ
في (القُمْقُمِ)
المسحور
مخزون
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يا
دجلةَ الخير:
كم من كنْز
موهبةٍ
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آت
فترضيك
عقبان
وتُرضيني
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لعلّ
يوماً
عصُوفاً
جارفاً
عرساً
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للسمع،
ما بين
ترخيمٍ
وتنوين
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يا
دجلةَ الخير:
إن الشعر
هدهدةٌ
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لحن
الحياة
رخيّاً
غَيْرَ
ملحونِ
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عفْواً
يردّد في
رَفْهٍ وفي
عَللٍ
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كفّ
الطبيعةِ
لوْحاً (سفرَ
تكوينِ)
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